sst pyq 2019 dwitiya pali-40 questions
SST PYQ 2019 द्वितीय पाली: 40 सवाल, जहाँ विकल्प धोखा देते हैं
2019 में सोशल साइंस का पेपर दो पालियों में हुआ था। सिलेबस एक, किताबें एक — फिर भी जो बच्चे पहली पाली का पेपर देखकर आत्मविश्वास में आ गए, उनमें से कई दूसरी पाली में वही नंबर नहीं ला पाए। वजह किताब नहीं थी। वजह सवाल पूछने का तरीका था।
नीचे उसी दूसरी पाली के ढाँचे पर 40 सवालों का टेस्ट रखा है — इतिहास, भूगोल, नागरिक शास्त्र और अर्थशास्त्र, चारों से। टेस्ट पूरा होते ही स्कोर सामने आता है और हर सवाल का सही जवाब भी दिखता है। इसलिए यह सिर्फ़ “कितने सही हुए” वाला हिसाब नहीं है। यह बताता है कि आप किस तरह के सवाल पर रुकते हैं, और असली पेपर में नंबर ठीक उसी जगह कटते हैं।
टेस्ट में क्या-क्या है
| सवाल | 40 — इतिहास, भूगोल, नागरिक शास्त्र, अर्थशास्त्र |
| समय | करीब 17 मिनट — स्क्रीन पर उलटी गिनती चलती रहती है |
| भाषा | हिंदी, बोर्ड के पेपर जैसी शब्दावली |
| फीस | मुफ़्त |
| लॉगिन | ज़रूरी नहीं |
| डिवाइस | मोबाइल, टैबलेट या लैपटॉप |
| रिजल्ट | तुरंत, सही जवाब के साथ |
शुरू करने से पहले एक छोटी चीज़ रख लीजिए — कागज़ और पेन। जो सवाल अटके, उनका नंबर साथ-साथ लिखते चलिए। टेस्ट के बाद यही सूची आपका असली सिलेबस बन जाएगी, क्योंकि उसमें वही सवाल होंगे जहाँ आपका दिमाग़ रुका था।
टेस्ट शुरू करने के लिए नीचे “Start” दबाइए
दूसरी पाली अलग क्यों लगती है
एक ही साल के दो पेपर देखकर बच्चे अक्सर यह कहते हैं कि दूसरा पेपर “ज़्यादा उलझा” था। सच यह है कि सवाल वही किताब से थे। बदलाव दो जगह था — सवालों का क्रम, और विकल्पों की भाषा।
क्रम का मतलब यह है कि जिस अध्याय से आपको आसान सवाल मिलने की उम्मीद थी, वहाँ से नहीं आया। और जिस अध्याय को आपने “आख़िर में देख लेंगे” कहकर छोड़ा, वहीं से दो-तीन सवाल आ गए। जो बच्चा सिर्फ़ पसंदीदा अध्याय पर भरोसा करता है, वह पहले ही पन्ने पर हिल जाता है।
विकल्पों की भाषा का मतलब यह है कि सही जवाब अक्सर वही होता है जो आपने रटा है, पर उसे ऐसे शब्दों में लिखा जाता है जो किताब में उसी पंक्ति में नहीं है। जो बच्चा पहचान से जवाब देता है, वह भी सही करता जाता है। जो बच्चा हूबहू शब्द ढूँढ़ता है, वह सही जानते हुए भी ग़लत विकल्प भर देता है।
यही वजह है कि इस टेस्ट को सिर्फ़ अंकों के लिए मत दीजिए। सवाल पढ़ते समय यह देखिए कि आप विकल्प चुनने का फ़ैसला किस आधार पर ले रहे हैं — याद से, अंदाज़े से, या काट-छाँट से। तीनों का इलाज अलग है।
40 सवाल, पाँच ढाँचे — किस पर कितना समय
चालीस सवाल और करीब सत्रह मिनट — यानी औसतन हर सवाल पर पच्चीस सेकंड। इस हिसाब से चलना है, वरना आसान सवाल पर समय बर्बाद होगा।
चालीस सवाल एक जैसे नहीं होते। अगर आप हर सवाल को एक ही रफ़्तार से पढ़ेंगे, तो आसान सवाल पर समय बर्बाद होगा और मुश्किल सवाल के लिए समय बचेगा ही नहीं। इसीलिए पहले ढाँचा पहचानिए, फिर समय तय कीजिए।
| सवाल का ढाँचा | पहचान | तरीका | समय |
|---|---|---|---|
| सीधा तथ्य | कौन, कब, कहाँ | जवाब पक्का याद है तो तुरंत भरिए, नहीं तो छोड़कर आगे बढ़िए | 15 सेकंड |
| कथन वाला | “कौन-से कथन सही हैं” | हर कथन पर अलग सही/ग़लत का निशान लगाइए, फिर विकल्प मिलाइए | 35 सेकंड |
| मिलान | सूची-I और सूची-II | जो जोड़ी पक्की है उसे पहले बाँधिए, बाकी अपने आप छँट जाएँगी | 30 सेकंड |
| नकारात्मक | “सही नहीं है” | आख़िरी शब्द पर उँगली रखिए, फिर तीन सही विकल्प काटिए | 20 सेकंड |
| आँकड़ा या नक्शा | प्रतिशत, दशक, जिला, नदी | यहाँ अंदाज़ा नहीं चलता; पाठ की संख्या याद हो तो ही भरिए | 25 सेकंड |
तालिका में लिखा समय कम से कम है, ज़्यादा से ज़्यादा नहीं। यानी सवाल पर इससे ज़्यादा मत रुकिए। जो सवाल इस समय में नहीं बना, उसे छोड़ दीजिए और अंत में लौटिए। छोड़ने की आदत पहले अजीब लगती है, पर यही आदत असली OMR में दस नंबर बचाती है।
चार हिस्से, चार अलग रणनीतियाँ
सोशल साइंस की तैयारी में सबसे बड़ी ग़लती यह होती है कि चारों विषयों को एक ही तरह पढ़ा जाता है। चारों की माँग अलग है, और पेपर में उनका व्यवहार भी अलग है।
इतिहास — तारीख़ें नहीं, क्रम याद कीजिए
इतिहास में बच्चे साल रटते हैं और फिर उलझ जाते हैं। साल अलग-अलग याद करने से भीड़ बन जाती है। इसकी जगह एक क्रम बनाइए — पहले क्या हुआ, उसके बाद क्या, और उसके बाद क्या। जब क्रम साफ़ होता है, तो 1919 और 1929 जैसे साल अपने आप सही जगह बैठ जाते हैं।
इसी तरह आंदोलनों को एक-दूसरे से जोड़कर देखिए। किस आंदोलन की वजह क्या थी, उसमें लोग कैसे जुड़े, और उसका असर क्या रहा। विकल्प वाले सवाल अक्सर इसी जोड़ पर बनते हैं — दो आंदोलनों के नाम आपको पता हैं, पर कौन-सी बात किसकी थी, यह पूछा जाता है।
भूगोल — नक्शा और संख्या, दोनों साथ
भूगोल के सवाल दो तरह के होते हैं। एक वे जिनमें नाम पूछा जाता है — कौन-सी मिट्टी, कौन-सी नदी, कौन-सा उद्योग। दूसरे वे जिनमें संख्या पूछी जाती है — कितना प्रतिशत, कितना हिस्सा। पहले तरह के सवाल नक्शे से पकड़ में आते हैं, दूसरे तरह के सवाल सिर्फ़ पाठ के आँकड़ों से।
इसलिए भूगोल पढ़ते समय किताब के बगल में एक छोटा नक्शा बनाइए और उस पर नाम भरते चलिए। जो नाम नक्शे पर बैठ गया, वह परीक्षा में नहीं भूलता। और आँकड़ों के लिए एक अलग पन्ना रखिए — सिर्फ़ संख्याएँ, बिना वाक्य। दोहराने में यही पन्ना सबसे तेज़ होता है।
नागरिक शास्त्र — “कौन करता है” वाले सवाल
नागरिक शास्त्र में सबसे ज़्यादा सवाल अधिकार और व्यवस्था पर आते हैं। बच्चे परिभाषा तो याद कर लेते हैं, पर यह नहीं पकड़ पाते कि कौन-सी संस्था क्या करती है। जब विकल्प में दो संस्थाएँ रख दी जाएँ, तो परिभाषा काम नहीं आती।
तरीका सीधा है। हर अध्याय पढ़ते समय एक कॉलम बनाइए — कौन, क्या करता है, किसके लिए ज़िम्मेदार है। संघवाद हो या सत्ता की साझेदारी, यही एक कॉलम आपको विकल्पों में फँसने से बचाएगा।
अर्थशास्त्र — परिभाषा के साथ एक उदाहरण
अर्थशास्त्र के सवाल परिभाषा और उदाहरण के बीच घूमते हैं। क्षेत्रक हो, साख हो या वैश्वीकरण — हर अवधारणा के साथ एक छोटा उदाहरण जोड़ लीजिए। जैसे प्राथमिक क्षेत्र का मतलब खेती और खनन, द्वितीयक का मतलब कारखाना, तृतीयक का मतलब सेवा।
जब उदाहरण साफ़ होता है, तो विकल्प चुनने में देरी नहीं लगती। और अर्थशास्त्र में देरी सबसे महँगी है, क्योंकि सवाल छोटे होते हैं और उनमें सोचने की जगह कम होती है।
स्कोर आने के बाद — तीन बैंड, तीन रास्ते
रिजल्ट देखकर बच्चे दो काम करते हैं — या तो खुश हो जाते हैं, या निराश। दोनों में आगे का काम रुक जाता है। असली काम रिजल्ट के बाद शुरू होता है।
| स्कोर | इसका मतलब | आगे क्या करें |
|---|---|---|
| 34 से 40 | बेस मज़बूत है, रफ़्तार ठीक है | अब उसी स्तर के दूसरे साल के पेपर कीजिए; यहाँ रुकना नुकसान है |
| 25 से 33 | सबसे आम हालत — पढ़ा है, पर सवाल में लागू नहीं हो रहा | गलत सवालों की सूची बनाइए और तीन दिन सिर्फ़ उन्हीं पर काम कीजिए |
| 24 से नीचे | पाठ पढ़े बिना टेस्ट देना जल्दबाज़ी है | पहले दो अध्याय पढ़िए, फिर वही टेस्ट दोबारा; पहले पढ़ाई, बाद में रफ़्तार |
तीसरे बैंड वालों के लिए एक बात साफ़ कर दूँ — कम स्कोर का मतलब यह नहीं कि आप कमज़ोर हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि आपने ऐसे सवालों पर टेस्ट दिया जो अभी पढ़े ही नहीं गए। तैयारी के आख़िर में यही स्कोर बदल जाता है।
छह ग़लतियाँ जो सबसे महँगी पड़ती हैं
इन छह ग़लतियों को देखिए। इनमें से कोई भी पढ़ाई की कमी से नहीं होती — ये सब आदत की ग़लतियाँ हैं, और आदत बदलना सबसे आसान काम है।
- पहला विकल्प पढ़कर निशान लगाना। वस्तुनिष्ठ पेपर का सबसे बड़ा जाल यही है। चारों विकल्प पढ़िए, फिर भरिए। दस सेकंड का यह काम दो-तीन नंबर बचाता है।
- “सभी”, “केवल”, “सदैव” जैसे शब्द नोटिस न करना। जिस विकल्प में ये शब्द हों, उसे दोबारा पढ़िए। ज़्यादातर मौकों पर वही ग़लत विकल्प होता है।
- तारीख़ों को गोल-गोल याद करना। अलग-अलग साल रटने से भ्रम बढ़ता है। घटनाओं का क्रम बनाइए, साल अपने आप जुड़ जाएँगे।
- नक्शे और आँकड़े वाले सवाल छोड़ देना। ये सबसे आसान सवाल होते हैं, क्योंकि इनमें सोचना नहीं, याद करना होता है। जो बच्चे इन्हें छोड़ते हैं, वे सबसे आसान नंबर छोड़ते हैं।
- टेस्ट के बाद समीक्षा न करना। सिर्फ़ स्कोर देखकर आगे बढ़ जाना सबसे बड़ी ग़लती है। हर ग़लत सवाल का कारण लिखिए — पढ़ा नहीं था, भूल गया, या विकल्प ग़लत पढ़ा।
- एक ही टेस्ट बार-बार देना। दोबारा देना ज़रूरी है, पर उसी सवाल पर अटकना भी ठीक नहीं। दूसरा टेस्ट दूसरे साल का दीजिए, ताकि सवाल बदलते रहें।
सात दिन का छोटा प्लान
अगर इस टेस्ट के बाद समझ नहीं आ रहा कि आगे क्या करें, तो यह तालिका follow कीजिए। रोज़ का काम छोटा है, पर सात दिन में पूरा सिलेबस एक बार छँट जाता है।
| दिन | काम | समय |
|---|---|---|
| पहला | ग़लत सवालों की सूची बनाइए और उनके अध्याय चिह्नित कीजिए | 20 मिनट |
| दूसरा | इतिहास के दो अध्याय — सिर्फ़ क्रम और नाम | 30 मिनट |
| तीसरा | भूगोल के दो अध्याय — नक्शा और आँकड़े | 30 मिनट |
| चौथा | नागरिक शास्त्र — संस्था और अधिकार वाला कॉलम | 30 मिनट |
| पाँचवाँ | अर्थशास्त्र — हर अवधारणा के साथ एक उदाहरण | 30 मिनट |
| छठा | यही टेस्ट दोबारा — पिछला स्कोर सामने रखकर | 20 मिनट |
| सातवाँ | दूसरे साल का पेपर, समय देखकर | 20 मिनट |
सात दिन में कुल तीन घंटे से थोड़ा ज़्यादा का काम है। पर यह बिखरा हुआ नहीं है — हर दिन का हिस्सा तय है और हर हिस्सा पेपर से जुड़ा है। यही तरीका आख़िरी महीने में सबसे ज़्यादा काम आता है।
टेस्ट शुरू करने से पहले तीन बातें
- शांत जगह चुनिए। चालीस सवाल कम लगते हैं, पर जब टाइमर चल रहा हो तो हर आवाज़ ध्यान खींचती है। दस मिनट का शांत समय, शोर में बैठकर दिए गए आधे घंटे से बेहतर है।
- कागज़-पेन पास रखिए। जो सवाल अटके, उनका नंबर लिखिए। यह छोटी आदत आगे की पूरी तैयारी की दिशा तय कर देती है।
- पहले प्रयास में रफ़्तार मत देखिए। पहला टेस्ट समझने के लिए है, दूसरा रफ़्तार के लिए, और तीसरा पक्का करने के लिए। तीनों का मक़सद अलग है।
2019 का पेपर आज क्यों पढ़ें
कई बच्चे पूछते हैं कि पुराने साल के पेपर से क्या फायदा, जब सवाल दोबारा नहीं आते। बात सही है — सवाल दोबारा नहीं आते। लेकिन सवाल पूछने का ढंग बार-बार लौटता है।
किसी भी बोर्ड का पेपर तीन चीज़ों से बनता है — पाठ्यक्रम, अंकभार और पूछने की शैली। पुराना पेपर तीसरी चीज़ का सबसे साफ़ नमूना है। उसमें देखिए कि किस पाठ से कितने सवाल आए, किस तरह के वाक्य बने, और विकल्प कैसे लिखे गए। यही पैटर्न अगली बार भी दोहराया जाएगा, चाहे सवाल नए हों।
एक और फायदा है। जब आप तीन-चार साल के पेपर एक साथ देखते हैं, तो पता चलता है कि कौन-से अध्याय हर साल लौटते हैं। उन अध्यायों को पहले पढ़ना, बाकी को बाद में — यही रणनीति आख़िरी महीने में सबसे ज़्यादा नंबर देती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या यह टेस्ट 2027 की बोर्ड परीक्षा के लिए भी काम आएगा?
हाँ। सोशल साइंस का पाठ्यक्रम और पूछने का ढाँचा एक जैसा रहता है। पुराने पेपर इसलिए काम आते हैं क्योंकि उनसे पता चलता है कि बोर्ड किस तरह सवाल बनाता है — और यह समझ किसी भी साल के पेपर में लगती है।
इस टेस्ट के सवाल कहाँ से लिए गए हैं?
2019 की द्वितीय पाली के पेपर के ढाँचे पर, बोर्ड के पाठ्यक्रम के अंदर से। सवालों की भाषा और विकल्पों का तरीका वैसा ही रखा गया है, ताकि अभ्यास के समय असली पेपर जैसा ही महसूस हो।
क्या टेस्ट दोबारा दिया जा सकता है?
हाँ, जितनी बार चाहें। दोबारा देने पर स्कोर से यह पता चलता है कि आपने ग़लतियाँ सुधारीं या वही ग़लती दोहराई। सिर्फ़ पहला स्कोर देखकर रुकना ठीक नहीं, क्योंकि असली सुधार दूसरे प्रयास में दिखता है।
मोबाइल पर चलेगा?
हाँ, बिना कोई ऐप डाउनलोड किए। टेस्ट ब्राउज़र में ही खुलता है और रिजल्ट भी वहीं दिखता है। एक सलाह — अगर घर में लैपटॉप है तो उसी पर दीजिए, क्योंकि सवाल पढ़ने में आँख कम थकती है।
रिजल्ट में सही जवाब दिखेंगे या सिर्फ़ नंबर?
दोनों। स्कोर के साथ हर सवाल का सही जवाब दिखता है। इसीलिए टेस्ट के बाद रुकिए और ग़लत सवालों को पढ़िए — यही दो मिनट पूरे टेस्ट से ज़्यादा सिखाते हैं।
क्या लॉगिन या ईमेल देना पड़ेगा?
नहीं। टेस्ट शुरू करने के लिए सिर्फ़ नाम लिखना होता है, ताकि रिजल्ट आपके नाम से दिखे। कोई अकाउंट बनाने की ज़रूरत नहीं।
इसी सिलसिले के अगले पेज
अगर इस पेपर के बाद और अभ्यास चाहिए, तो नीचे वाले पेज क्रम से कीजिए। हर पेपर का ढाँचा थोड़ा अलग है, इसलिए एक ही तरह के सवालों पर अटकना बंद हो जाता है।
- SST PYQ 2019 प्रथम पाली — 40 सवालों का टेस्ट
- SST PYQ 2018 द्वितीय पाली — 40 सवालों का टेस्ट
- SST PYQ Class 10 — 39 सवालों का फ्री टेस्ट
- Social Science PYQ Class 10 — 42 सवालों का चैलेंज
- Bihar Board Class 10 Social Science Objective Question 2027 — 50 PYQ
- Bihar Board Class 10 Online Test 2027 — रोज़ 30 मिनट का 30 दिन प्लान
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आख़िरी बात
टेस्ट देने के बाद जो स्कोर आए, उसे अपनी पहचान मत बनाइए। वह उस दिन की एक तस्वीर है, पूरी तैयारी का फ़ैसला नहीं। असली काम उसके बाद शुरू होता है — ग़लतियों को देखना, उनका कारण ढूँढ़ना, और उसी सवाल पर अगली बार न रुकना।
2019 की द्वितीय पाली का पेपर इसलिए याद रखा जाता है क्योंकि उसमें सवाल सीधे थे और विकल्प चालाक। जो बच्चा विकल्प पढ़ना सीख गया, वह उस पाली से निकल आया। आपके पास भी वही मौक़ा है — बस चालीस सवाल, और थोड़ा ठहराव।
क्लास 10 · फ्री स्टडी मटेरियल
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